कोष मूलो दंडः

- By राजेश चन्द्र प्रसाद

चाणक्य आज भी सार्थक हैI उन्हें आज भी हम एक महान अर्थशास्त्री, कूटनीतिज्ञ एवं राजनैतिक पंडित के रूप में जानते हैI कर प्रणाली पर भी उनके विचार मौजूदा भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत ही सटीक हैI आयकर विभाग के प्रतीक चिन्ह ( Logo) मे एक सूत्र लिखा है – कोष मूलो दंडःI इस सूत्र को महान अर्थशास्त्री चाणक्य ने ही अर्थशास्त्र के पहले अध्याय में लिखा था I इसका अर्थ है ‘राजस्व प्रशासन की रीढ़ है’। कुछ अर्थशास्त्रियो ने इस सूत्र का अर्थ ऐसे भी निकाला कि- “धन मूल शक्ति है” या यूँ कहें कि “धन किसी भी राज्य की मूल शक्ति है”. एक ऐसा भी अर्थ निकाला गया कि- देश को सम्पन्न बनाने के लिए दण्ड व्यवस्था सुदृढ़ रखना चाहिए।

चाणक्य ने आगे ऐसा भी लिखा है- कर राज्य के लिए आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैI इस कारण राजस्व संग्रह अधिकारियों को ईमानदार, समर्पित और पेशेवर होना चाहिए। उनके अनुसार, राजस्व की हानि के पीछे कर्तव्य की उपेक्षा, अज्ञानता, भ्रष्टाचार, अहंकार, लालच और गैर-पेशेवर रवैया प्रमुख कारण हैं।

भारतीय राजस्व सेवा के 72वें बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों से मुलाकात के अवसर पर भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द  ने भी  अपने प्रासंगिक संबोधन में चाणक्य को उद्धरित करते हुए कहा था- “कर प्रणाली जितनी सरल होगी, अनुपालन सुनिश्चित करना उतना ही आसान होगा। याद रखें कि कर दाता आपका सहभागी है, न कि आपका विरोधी। एक बार पुनः यहाँ चाणक्य के शब्द प्रासंगिक नज़र आते हैं। उन्होंने कहा था कि सरकारों को कर उसी तरह लेना चाहिए, जैसे मधुमक्‍खी फूल से केवल उचित मात्रा में ही शहद लेती है और यह सुनिश्चित करती है कि दोनों का ही अस्तित्‍व बना रहे। आपकी भूमिका नीतिगत है और नियामक की भी है, लेकिन आप मुख्य रूप से सेवा प्रदाता हैं। ईमानदार कर दाता किसी सेवा के लिए आपके पास आता है इसलिए कृपया उसकी मांगों और गरिमा के प्रति संवेदनशील बनें। शिष्टता, शालीनता, विनम्रता और सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखने से कर दाताओं और कर संग्रहकर्ताओं के बीच आपसी विश्वास और सहयोग बनाने में बहुत सहायता मिलेगीI”

राष्ट्रपति महोदय के विचारों से भी यही प्रतीत होता है कि धन या कर राज्य की जरूरत तो है परन्तु उसका संग्रह दंड से नहीं विवेक एवं नीति से करना चाहिए I